Sunday, March 11, 2012

सवाल शर्म का नहीं कर्म का है...


भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया। गरीबी तो नहीं गई लेकिन भारत की वो तेज-तर्रार प्रधानमंत्री चल बसी। इंदिरा जी का गरीबी हटाओ वाला नारा मुझे इसी साल के दस जनवरी को फिर से याद गया। इसके लिए मैं भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह का शुक्रगुजार हूं। क्योंकि,दस जनवरी को उन्होंने कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म कहकर संबोधित किया। बता दूं कि मनमोहन सिंह ऐसा नहीं कहते अगर हंगामा नामक रिपोर्ट जारी नहीं होती। भूख और कुपोषण को लेकर नंदी फ़ाउंडेशन और 'सिटिज़ंज़ अलाएंज़ अगेंस्ट मैलन्यूट्रिशन' नामक संगठन की ओर से जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक़ कुपोषण की वजह से भारत में आज भी 42 फ़ीसदी से ज़्यादा बच्चे सामान्य से कम वज़न के हैं। बात अगर यहीं रुक जाती तो ठीक होता,लेकिन रही सही कसर पूरी यूनिसेफ ने पूरी कर दी। यूनिसेफ की एक ताजा रिपोर्ट में शहरी बच्चों की खराब हालत पर चिंता जताई गई है। ‘चिल्ड्रेन इन ऐन अरबन वर्ल्ड’ नाम की जारी रिपोर्ट में यूनिसेफ ने कहा कि शहरों में रहने वाले गरीबों की हालत गाँवों के गरीबों से ज्यादा खराब है। रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय शहरों में करीब 50,000 गंदी बस्तियाँ हैं और ऐसी बस्तियाँ भारत के पाँच राज्यों में केंद्रित हैं. ये हैं महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और गुजरात।आंकड़े की माने तो बस्तियों में रहने वाला तीन में एक व्यक्ति या तो नाले या रेल लाइन के किनारे रहता है। यूनिसेफ ने सरकार से आग्रह किया कि वो शहरों को भी लक्ष्य बनाकर नई योजनाएँ बनाए जैसा कि वो गाँवों के मामले में करती है। उधर सरकार ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक स्वास्थ पर कुल सरकारी खर्च को 2.5 प्रतिशत बढ़ाने का फैसला किया है। अभी ये 1.4 प्रतिशत है। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से ये भरोसा दिलाया गया है कि,स्वास्थ्य मंत्रालय सभी को स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया करवाने की दिशा में काम कर रहा है। यानी रिपोर्ट आई तो खलबली मच गई। भरोसा दिया जाने लगा कि,स्थिति बदली जाएगी। दरअसल जब से मैंने होश संभाला है,तभी से भरोसा जैसे शब्द सरकार की ओर से सुनता आ रहा हूं। आज तक भरोसा पर भरोसा ही करता रहा हूं और स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। सवाल है कि,गरीब,भूखमरी और कुपोषण कल नहीं भारत में दस्तक दी है बल्कि कई दशकों से यहां पर मौजूद है। लेकिन हमारी सरकार की नींद तभी क्यों खुलती है जब कोई रिपोर्ट सामने आती है। क्या आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हमारे प्रधानमंत्री इस बीमारी से बेखबर हैं,नहीं...बिलकुल नहीं क्योंकि,जब चुनावी मैदान में ये लोग उतरते हैं तो गरीबी पर जरूर दो-चार लाइन बोल देते हैं,तो फिर कैसे मान लिया जाए कि,वास्तव में गरीबी,कुपोषण और भूखमरी जैसे शब्दों पर मनमोहन जी को शर्म आती है। शर्म उन्हें इस बात पर आनी चाहिए कि,इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए उन्होंने क्या किया। अभी भी वक्त है सिंह साहब के पास इस शर्म से निजात पाने का। वरना साल 2014 को किसने देखा है।