Friday, June 22, 2012

लकीर जरूरी है...


समझ में नहीं आ रहा कि,आखिरकार हमारे राजनेता चाहते क्या हैं। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी कहते हैं कि,मुलायम सिंह यादव भाजपा के एजेंट हैं,और सोनिया गांधी कुर्सी बचाने के लिए मुलायम से दोस्ती करना चाहती हैं। यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान जरा दिग्विजय सिंह के तेवर को याद कीजिए। कैसे-कैसे बयानबाजी कर दिग्गी राजा मीडिया में हेडलाइन बन जाते थे,और अभी जब दिग्गी ने ममता दीदी को नखरेबाज कहकर संबोधित किया तो,कांग्रेस की ओर से फरमान जारी कर दिया गया कि, दिग्विजय सिंह अपनी जुबान को लगाम दें। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार में भाजपा की बदौलत सीएम की कुर्सी पर विराजमान हैं,लेकिन उनको गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा पंसद नहीं है। जिस नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुखिया बनाने के लिए कभी संजय जोशी ने जी तोड़ कोशिश की,उसी संजय जोशी के चलते मोदी को अब सीएम की कुर्सी पर खतरा मंडराते नजर आ रहा है। मोदी को विकास पुरुष कहने वाले लाल कृष्ण आडवाणी को अब ये बात नागवार गुजर रही है कि,नरेंद्र मोदी दिल्ली की कुर्सी पर विराजमान होने का ख्वाब क्यों संजो रहे हैं। कहने तो सुषमा स्वराज...नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को छोटा भाई कहती हैं,लेकिन बड़ी बहन मुंबई कार्यकारिणी की बैठक में मोदी को दी जा रही तवज्जों और गडकरी को दूसरी बार अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी संविधान में किए गए संशोधन से इस कदर खफा हो गई कि,मायानगरी मुंबई की हलचल को छोड़ सीधे पहुंच गई आस्था की कार्यशाला में। मोदी के बढ़ते कद को लेकर भाजपा के कुछ नेता इस कदर परेशान हो गए कि,पार्टी के मुखपत्र कमल संदेश में इस बात का जिक्र करना पड़ा कि,पार्टी से बढ़कर कोई नहीं हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि,गुटबाजी नहीं होने का ढिंढौरा पीटने वाली भाजपा आखिकार मोदी के बढ़ते कद से खुश होने के बजाए बेचैन क्यूं नजर आ रही है। चाल,चरित्र और चेहरा के सहारे सियासी मैदान में बाजी मारने वाली भाजपा को आखिर हो क्या गया है? खैर ये तो राजनीति है और यहां कुछ भी हो सकता है और सब कुछ जायज भी है। तभी तो आदिवासी राष्ट्रपति बनाने का बिगुल बजाने वाले पीए संगमा इतने स्वार्थी हो गए कि,राष्ट्रपति चुनाव में किसी आदिवासी के नाम को बढ़ाने के बजाए खुद आगे बढ़ गए और मीडिया के सामने हंसते  हुए कह दिए कि,वो राष्ट्रवादी के बजाए आदिवासी कहलाना पंसद करेंगे। देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर रही है,गलत नीतियों के चलते आमलोगों जीना मुहाल हो रहा है,और नेता हैं कि,उन्हें देश की चिंता के बजाए अपने रसूख को कायम रखने की जद्दोजहद से फुर्सत ही नहीं है। आखिर एक लकीर तो खींचनी होगी,जिससे देश का भी कुछ भला हो। सियासत के मैदान में गोता लगाने वाले सियासतदां कभी मौका मिले तो सोचिएगा जरूर...क्योंकि,चुनाव हर पांच साल बाद होते ही हैं...और उसके बाद क्या होगा...ये मुझसे बेहतर आप जानते होंगे। याद रखिएगा...कुछ थप्पड़ों की गूंज तो नहीं सुनाई देती,लेकिन उसके जख्म बहुत गहरे होते हैं।
















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