Monday, October 10, 2011

जग को जीत चला गया मुसाफिर



(होठों से छू लो तुम...बन जाओ मीत मेरे,मेरा प्रीत अमर कर दो)...
जगजीत सिंह...आज भले ही ये महान फनकार हमारे बीच नहीं है। लेकिन उनकी आवाज हमेशा कायनात में गूंजती रहेगी। गजल सम्राट जगजीत सिंह ने कम ही वक्त में लोगों के दिल में ऐसी जगह बना ली। जो उनके जाने के बाद भी कायम है। जग को जीत कर वो हमेशा के लिए अलविदा कह गए।किसी ने लिखा है कि मुसाफिर है ये जिंदगी, एक दिन आना और फिर एक दिन जाना भी है सबको...। इस शख्सियत के चले जाने से गजल अपने आप को तन्हा महसूस कर रही है और कह रही है...चिट्ठी न कोई संदेश...

Thursday, October 6, 2011

प्लीज...अब तो बख्श दो



गुजरात में 2002के दंगों के दौरान वे दंगाइयों से हाथ जोड़कर रहम मांग रहे थे। वे अब गुजरात पुलिस से आग्रह कर रहे हैं, ‘प्लीज! मेरी तस्वीर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दें।’
अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर को कुतुबुद्दीन अंसारी ने 9 जून को पत्र लिखा। यह अब प्रकाश में आया है। इसमें उन्होंने लिखा है, ‘आज मैं अपने परिवार के साथ शांति से रह रहा हूं। यही नहीं, मेरे बच्चे भी अच्छे माहौल में रह रहे हैं। मुझे दुख होता है, जब मैं हाथ जोड़े हुए अपनी तस्वीर को अखबारों, वेबसाइटों और स्वयंसेवी संगठनों की रिपोर्टो के कवर पर देखता हूं। इसमें मेरी लाचारी नजर आती है। मैं आग्रह करता हूं कि प्लीज, मेरी तस्वीर के भविष्य में किसी भी तरह के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। साथ ही, सभी जगहों से इसे हटा दिया जाए।’




अंसारी ने बताया, ‘दंगो के बाद मैं महाराष्ट्र के मालेगांव चला गया। उसके बाद सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस नाम एनजीओ की मदद से कोलकाता आ गया। यहां एक साल रहा। इसी दौरान मालूम हुआ कि मेरी तस्वीर को लोग अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।’ उनके मुताबिक, ‘दंगा पीड़ित होने के बावजूद अब तक उचित मुआवजा नहीं मिला। अहमदाबाद कलेक्टर को आवेदन दिया। वह खारिज हो गया। बताया गया कि आवेदन 2002 में ही दाखिल करना था।’
याद है वह घटना अंसारी ने पत्र में बताया कि जब दंगे शुरू हुए वह शहर के नरोदा इलाके में रहते थे। इलाके में दंगाइयों ने हमला कर दिया। वे भी फंस गए। जब वे उनसे रहम की गुजारिश कर रहे थे, किसी फोटोग्राफर ने तस्वीर खींच ली। बाद में पुलिस ने उन्हें बचाया।

क्रोध की आग में जलता समाज



रामलीला मैदान में पुलिस की बर्बरता का शिकार हुई राजबाला अब इस दुनिया से रुखसत हो चुकी है। हरियाणा के सोनीपत में उसकी चिता की आग भले ही शांत हो गई है। लेकिन उसकी राख के भीतर अब भी कई सवाल कौंध रहे हैं। या यूं कहे कि,समाज,सरकार और सिस्टम से ये पूछ रहा है कि,क्या इसी हिंसात्मक समाज,सरकार और सिस्टम का सपना बापू ने देखा था। मैं सोचता हूं अच्छा हुआ बापू हमें अलविदा कह गए। अगर हमार बीच होते तो मौजूदा हालात को देख उनकी आंखों से आंसू छलक पड़ते। हिंसात्मक समाज के इस मौजूदा स्वरूप को देखकर बेचैन हो उठते। जिस तरीके से आज बात-बात पर लोगों को गुस्सा आ जाता है। जिस तरीके से लोग क्रोध की ज्वाला को खून बहाकर शांत करते हैं। जिस ढंग से लोग रिश्तों को शर्मसार कर रहे हैं। वो कतई एक सभ्य समाज का परिचय नहीं हो सकता। बीते चार जून को रामलीला मैदान में जिस तरीके से पुलिसवालों ने अपना फर्ज निभाया। उसे कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। ये सच है कि,भीड़ पर काबू पाने के लिए कभी-कभी लाठी चलाने की जरूरत आन पड़ती है। लेकिन उसके भी तरीके हैं। आज हमारे बीच के ज्यादातर खाकीधारी अपने फर्ज और तरीके को भूल चुके हैं। रामलीला मैदान में भी उस रात जितने भी पुलिसवाले मौजूद थे। उनमें से अधिकांश फर्ज और नियम-कायदों को भूलकर वर्दी के नशे में चूर थे। तभी तो उन्होंने राजबाला पर इस तरह लाठी से प्रहार किया कि,उसकी रीढ की हड्डी ही टूट गई और आखिरकार 26 सितंबर 2011 को वो दर्द से कराहती हुई इस जहां को अलविदा कह गई। सरकार और सिस्टम के गलत रवैये के चलते ही समाज की रक्षा के लिए वर्दी पहनने वाले पुलिसकर्मी दरिंदे का रुख अख्तियार करते जा रहे हैं। यूपी के चंदौली में भी 27 सितंबर को पुलिस की दरिंदगी का शिकार एक ट्रक चालक को होना पड़ा। चंदौली के नौबतपुर में पुलिसवालों को ये बात नागवार गुजरी कि, ट्रक चालक ने रिश्वत क्यों नहीं दिया। कानून के रखवाले इस कदर क्रोधित हो उठे कि,पीट पीटकर उसकी जान ले ली। फ्लैश बैक में जाएंगे तो ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे। सिर्फ पुलिसवाले या सरकार में शामिल लोग ही अंहकार की आग में नहीं जल रहे। बल्कि समाज में भी ऐसे हजारों दास्तान मिल जाएंगे। मैं इस वक्त छत्तीसगढ़ में कार्यरत हूं। इसीलिए यहां की कुछ हिंसक वारदात के बारे में बता रहा हूं। यहां पर ज्यादातर खबरें ऐसी आती हैं। जिसमें कोई बाप अपने बेटे को महज इसलिए मार देता है ताकि उसे संपत्ति का बंटवारा न करना पड़े। कोई भतीजा अपने चाचा को कत्ल इसलिए कर देता है,क्योंकि उसे चाचा का डांटना पंसद नहीं था। कोई पति अपनी पत्नी को इसलिए जिंदा जला देता है,क्योंकि उसकी पत्नी उसे शराब छोड़ देने को कहती है। इतना ही नहीं कई ऐसी खबरें भी सामने आई हैं या आते रहती है जिसमें मामूली विवाद पर इंसान-इंसानियत को भूल हैवान बन जाता है। ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरता जिस दिन इंसानियत का खून न होता हो। आखिर क्या हो गया है हमारे समाज को,जो बात-बात पर क्रोध की ज्वाला धधक उठती है। आखिर कब बंद होगा इंसानियत को शर्मसार करने का ये खेल ?...आखिर कब बुझेगी ये आग ?...आखिर कब ?...

चाल,चरित्र और चेहरा



हमारे देश में संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है। लेकिन अफसोस कि,इस मंदिर में जनता के प्रतिनिधि के तौर पर विराजमान तथाकथित देवता जितने सफेद कपड़े पहनते हैं। उतने ही काले उनके विचार और मन हैं। 16 अगस्त 2011 से पहले ऐसा महसूस होता था कि, कुछेक सफेदपोश ही भ्रष्टाचार को खत्म नहीं होने देना चाहते। पर अन्ना के आंदोलन दौरान और बाद में ये अच्छे तरीक से समझ में आ गया कि,ये सारे के सारे हमाम में नंगे हैं। मेरे विचारों पर सबसे पहली मुहर कांग्रेस के युवा प्रवक्ता मनीष तिवारी ने लगाई। अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन का आगाज किया और महाशय मनीष तिवारी ने बडे़ ही बेशर्मी के साथ अन्ना जैसे बेदाग छवि वाले को भ्रष्टाचारी तो कहा ही, साथ ही उन्हें 'तुम' कहकर भी संबोधित कर दिया। इसके बाद पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय ने अन्ना को पागल कह दिया। फिर संसद में लोकपाल के मुद्दे पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की बोलने की बारी आई। उनके बोलने के पहले मैं ऐसा सोच रहा था कि,वे जरूर कुछ अच्छा बोलेंगे। लेकिन उन्होंने मेरी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। राहुल ने लोकसभा में हंगामें के बीच लिखा हुआ भाषण पढ़ दिया। बड़ा दुख हुआ जो शख्स एक मजबूत भारत का सपना देख रहा है। उसकी नींव इतनी खोखली होगी। कांग्रेसी नेताओं ने दिल तोड़ा तो आस भाजपा से लगा बैठा। लगा कि,भाजपा विश्वासघात नहीं करेगी। लेकिन जनलोकपाल के मुद्दे पर भाजपा ने भी अपना असली चेहरा दिखा दिया। पूरे संसद में उस दिन कोई ऐसा नहीं था जो खुलकर अन्ना के समर्थन में बोलता। इसके बाद जब अन्ना ने लोगों से अपने-अपने जनप्रतिनिधियों के आवास के बाहर धरना-प्रदर्शन करने की अपील की। तो सांसद अजीबोगरीब स्थिति में आ गए और आनन-फानन में सबने एक स्वर में अन्ना के तीनों शर्तों पर सहमति की मुहर लगा दी। इस पूरे घटनाक्रम में कई बातें सामने आई। जिस पर सोचना लाजिमी है। अन्ना के आंदोलन के दौरान अभिनेता ओमपुरी ने हमारे सांसदों को नालायक,अपपढ़ और गंवार कहा। किरण बेदी ने बेहरुपिया कहा तो इन सबको मिर्ची लग गई। सांसदों ने इसे संसद का अवमानना करार दे दिया। शरद यादव ने तो लंबा-चौड़ा भाषण दे दिया। सच कड़वा होता है दोस्तों और इस कड़वाहट को पचा पाना इन सफेदपोशों के बस में नहीं। अवमानना शब्द के मायने शायद हमारे सांसदों को नहीं पता है। अगर होता तो शरद यादव जैसे अनुभवी नेता राष्ट्रपति को 'सफेद हाथी' और राज्यपाल को 'बूढ़ी गाय' नहीं कहते। लालू प्रसाद यादव लोकतंत्र के मंदिर में सोते नहीं। मनीष तिवारी,सुबोधकांत सहाय अन्ना को 'तुम' और 'पागल' नहीं कहते। कांग्रेस के बतौलेबाज महासचिव दिग्विजय सिंह अन्ना को भाषा पर नियंत्रण रखने की सीख नहीं देते। दिग्गी राजा को कौन बताए कि,अन्ना के पोशाक जितने सफेद हैं। उतनी ही साफ-सुथरी उनकी छवि है। गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले दिग्गी अन्ना के चरित्र के आगे कहीं नहीं टिकते। हमारे जनप्रतिनिधि कहते हैं कि,उनकी चाल बिलकुल सटीक है। चरित्र बेदाग है और चेहरा कमल की पंखुरियों के सामान कोमल हैं। तो फिर उन्हें जनलोकपाल बिल से एतराज क्यों है। ऐसा तो नहीं कि,अन्ना का जनलोकपाल बिल उनकी चाल का राज खोल देगा। उनके बेदाग चरित्र के पीछे छिपे धब्बों को उजागर कर देगा और कमल की पंखुरियों के तले उन्होंने भ्रष्टाचार की जो परत तैयार की है। उसे कुरेद कर जनता के सामने रख देगा। अरे महोदयों,अपने चाल,चरित्र और चेहरा का ख्याल नहीं है तो कम से कम देश के चाल,चरित्र,चेहरा का मान तो रखिए। अंत में आप सबों के लिए बशीर बद्र की ये पंक्तियां 'सभी चार दिन की हैं ये चांदनी,ये रियासतें,ये वजारतें...मुझे उस फ़कीर की शाने दे,के ज़माना जिसकी मिसाल दे'।