Sunday, August 21, 2011

कब बड़े होंगे राहुल बाबा...?

साल 2004 में राहुल गांधी ने पूर्ण रूप से राजनीति में कदम रखा। ये वो वक्त था जब कांग्रेस उथल पुथल के दौर से जूझते हुए सत्ता में आई। राहुल के राजनीति में आने के बाद देश के एक बड़े तबके को उनमें बहुत सारी उम्मीदें और विजन दिखाई पड़ी। उनमें उम्मीद की किरण दिखाई देने के बहुत सारे कारण हैं। पहला तो ये कि वे स्वर्गीय राजीव गांधी, जो विजन के धनी माने जाते थे,के पुत्र हैं और दूसरा ये कि, उन्होंने सियासी मैदान पर कदम रखते ही भारत को समझने की शुरुआत कर दी।
आगाज उन्होंने दक्षिण में रहने वाली गरीब और विधवा महिला कलावती के घर से किया। इसके बाद वो कई गांवों का दौरा किये। गरीबों के घर रात बिताया,खाना खाया। उनके दुख-दर्द को समझने की कोशिश करते नजर आए। वे युवाओं से भी संपर्क करते रहे। उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किए। अब तक के पत्रकारिता में मैंने बहुत सारे भाषण राहुल गांधी के सुने हैं। वे जहां भी जाते हैं दो भारत की बात करते हैं। भ्रष्टाचार होने की बात कबूल करते हैं और विरासत में राजनीति मिलने की बात को सहज भाव से स्वीकार करते हैं। इन बातों पर गौर करें तो मेरी तरह आपको भी लग सकता है कि,राहुल में अपने पिता की तरह विजन है। लेकिन इसके दूसरे पहलू पर भी गौर कीजिए।
राहुल दो भारत की बात करते हैं। यानी अमीर भारत और गरीब भारत। राहुल कहते हैं उन्हें इस फासले को मिटाना है। पर क्या सिर्फ बातें करने से ये खाई पट जाएगी। या फिर गरीबों के घर सोने,खाना खाने या फिर उन्हें कंबल बांट देने से ? राहुल को ये बात जेहन में बिठाना ही होगा कि, गरीबों से मिलने,हमदर्दी जताने भर से कुछ पल के लिए गरीबों की हिम्मत तो बढ़ायी जा सकती है, लेकिन आजीवन इस दर्द को मिटाया नहीं जा सकता। उन्हें याद रखना होगा कि, उनकी दादी इंदिरा गांधी ने भी गरीबी मिटाओ का नारा दिया था। इस नारे की बदौलत वो सत्ता में आई भी। पर वो गरीबी को मिटाने में नाकामयाब रही। राहुल को अतीत से सबक लेनी चाहिए। सिर्फ बातें करने से गरीबी नहीं मिटेगी। इसके लिए फैसले लेने होंगे और उसे लागू करने के लिए ढृढ इच्छाशक्ति के साथ उन फैसलों पर अमल करना होगा। राहुल को याद रखना होगा कि, आज भी भारत में 60 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे पैदा होते ही कुपोषण का शिकार क्यों हो जाते हैं ? शहरी या ग्रामीण इलाकों के लोग भूखमरी का शिकार क्यों हो रहे हैं ? क्या कभी उन्होंने सोचा है कि,जिस कलावती से वो मिलने गए।
जिस कलावती पर उन्होंने लंबा-चौड़ा भाषण संसद में दिया। उसके परिजन क्यों खुदकुशी किए ? उन्होंने कभी सोचा है कि,जिस छत्तीसगढ़ में आकर वो गरीबों की सूरत और सिरत बदलने का भाषण दिये थे। उसी छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा के कई इलाकों में लोग क्यों दशकों से भूख से जूझ रहे हैं ? पिछले सात सालों से उनकी सरकार या यूं कहें कि, वो खुद सत्ता में हैं तो फिर ऐसे में वो किसके इंतजार में बैठे हैं। वो पिछले कुछ दिनों से किसानों के मसीहा बनने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं(खासकर उत्तरप्रदेश में)। यूपी में कहीं भी कुछ होता है, वो उनसे मिलने बड़े ही नाटकीय अंदाज में पहुंच जाते हैं। धारा 144 लागू होने के बावजूद वो अपनी चौपाल लगाने और पदयात्रा करने से बाज नहीं आते। अलीगढ़ में उन्होंने किसानों की समस्याओं को सुलझाने के लिए महापंचायत का आयोजन किया। लेकिन महापंचायत तब्दील हो गया चुनावी रैली में। किसानों का नेता बनने में कोई हर्ज नहीं है।
लेकिन राहुल गांधी को ये भी ख्याल रखना होगा कि,वे भारत के भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। इसलिए उन्हें किसी दायरे में नहीं सिमटना चाहिए। भ्रष्टाचार के बारे में राहुल गांधी के पिता ही कहते थे कि,आम आदमी को उसका वाजिब हक नहीं मिलता। राहुल भी अपने भाषण में विरासत में मिली ये लाइनें कई बार दोहराते नजर आए हैं। पर ताज्जुब की बात ये है कि, वे ये कोशिश करते नहीं दिखाई दे रहे कि,आखिर इस बंदरबांट पर कैसे लगाम लगाया जा सके। अगर सही मायने में राहुल भ्रष्टाचार का निदान चाहते हैं तो उन्हें आगे आना चाहिए। उन्हें उस 74 साल के बुजुर्ग अन्ना हजारे का साथ देना चाहिए जो इस दीमक को जड़ से मिटाने के लिए कमर कस चुके हैं।
मुझे समझ में नहीं आता कि,देश आंदोलन की दौर से गुजर रहा है और वो तमाशबीन बने हुए हैं। राहुल गांधी आप भारत को समझिए,लेकिन समझते-समझते इतना वक्त जाया न कर दीजिए कि,लोग ये समझने लगे कि,आप भी वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं। आपको भी सियासी चाटूकारिता पसंद है। और आपके कथनी और करनी में फर्क है। राहुल बाबा देश बदल रहा है। धीरे से नहीं तेजी के साथ परिवर्तन जारी है। बदलाव की ये बयार ऐसी है, जिसमें आशा की किरण है।

एक बनता हुआ भारत आपके सामने है। जिसके कई सपने हैं। इनमें कई राजनीति की जमीन से उगते हैं,तो कई समाज से। इस भारत में बहुत सारे सपने हैं। अंत में एक पत्रकार होने के नाते मैं आपसे यही उम्मीद रखता हूं कि,आप इन मुद्दों पर खुलकर बोलेंगे। सपने को साकार करने के लिए कुछ करते दिखाई देंगे। अमीर और गरीब भारत के फासले को कम करने का वक्त आ चुका है। इसलिए विरासत में मिली राजनीति का इस्तेमाल कीजिए। कब तक समझते रहेंगे भारत को। राहुल बाबा वक्त की पुकार है