Monday, January 31, 2011

बापू को नमन



आदरणीय बापू,
बापू तुम कहाँ हो?.हम तुम्हे अक्सर चौक चौराहों पर मूर्तियों के रूप में खड़े देखते है.लेकिन तुम से बात नहीं कर पाते.बापू तुम लौट क्यों नहीं आते.एक बार लौट आओ न बापू.सच कहता हु बापू.अब सहन नहीं होता.दिल कचोट कर रह जाता है.बहुत बात करनी है बापू तुमसे.एक दो नहीं हजारो ऐसी बातें है। जो सिर्फ और सिर्फ तुम ही समझ सकते हो.देखो न बापू तुम्हारे हिंदुस्तान की क्या हालत हो गई है.तुमने हमें कुटीर उधोग का मंत्र दिया था.बापू हम नहीं माने.आज पूरे देश में हाहाकार मचा है.बापू किससे कहू कि आज इंसान.इंसान पर विशवास नहीं कर पा रहा.तुमने पंचायती राज का सपना दिखाया था.लेकिन पंचायती राज के नाम पर आज जो लोग कुर्सी पर बैठे है उनका नाम लेते हुए भी शर्म आती है.बापू हम जानते है.तुम्हे दुःख होता होगा.बताओ न बापू हम क्या करे.हम वोट देने ज़रूर जाते है.लेकिन चेहरों के अलावा कभी कुछ बदलते आजतक नहीं देखा बापू.दरिया,समंदर ,धरती,आकाश.सभी तुम्हारा फिर से इंतजार कर रहे है.बापू तुम ये मत सोचना कि हम तुम्हे ३० जनवरी और २ अक्तूबर को याद करते है.यकीं मनो बापू.जब कभी राम का नाम लेकर हमारे पास कोई वोट मांगने आता है.तुम हमें याद आने लगते हो.जब कभी राम का नाम लेकर कोई सिरफिरा किसी लड़की ,किसी मासूम पर जुल्म ढाता है. तुम हमें याद आने लगते हो.क्या -क्या कहू बापू . तुमने हमे जीने का मंत्र सिखाया था.लेकिन हमारे गुरु अब पच्छिम वाले हो गए.उनकी बातो को जायदा वजन दी जाने लगी है बापू.हम जानते है बापू तुम लौटकर नहीं आ सकते.फिर भी सोचता हु बापू.तुम जहाँ हो वही ठीक हो.आज का हिंदुस्तान अब तुम्हारे रहने लायक नहीं रह गया है.किस किस को समझाओगे तुम.कौन तुम्हारी सुनेगा.अब बस बापू .इतना ही कहना चाहता हू कि काश तुम लौट पाते ?....

Sunday, January 23, 2011

एक कोशिश तो कीजिये...



बिहार के मधुबनी जिले की पहचान आमतौर पर मिथिला पेंटिंग के साथ माछ(फिश ),पान और माखन से है.पर इस जिले की एक और खासियत है.यहाँ के लोग कोशिश करने से कभी पीछे नहीं हटते.हम आपको एक ऐसे ही शख्स की कहानी ब्लॉग के ज़रिये बता रहे है.फोटो में जो शख्स रिक्शा के पास खड़ा है.वो मधुबनी जिले के झंझारपुर का रहने वाला मजलूम नदाफ है.कुछ दिनों पहले तक इनकी जिन्द्गगी में खुशिया नहीं के बराबर थी.बार-बार सरकारी दफ्तर का चक्कर काटने के बाद भी नदाफ को इंदिरा आवास नहीं मिल रहा था.लेकिन साल २००६ में नदाफ ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया.और महज दस दिनों के अन्दर बिना रिश्वत दिए इन्हें इंदिरा आवास मिल गया.तभी से नदाफ ने ये बीड़ा उठाया कि.वो सभी को सूचना के अधिकार के बारे में बताएगा.ताकि दूसरे लोगो को भी इसका लाभ मिल सके.वही नदाफ की इस उपलब्धि से आसपास के लोग खासे प्रभावित है.और नदाफ की सराहना करते नहीं थकते.नदाफ की सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि .सूचना के अधिकार के इस तरह से इस्तेमाल के लिए उसे "बेस्ट सिटिजनशिप अवार्ड" से नवाजा गया .अनपढ़ नदाफ भले इस सम्मान की भव्यता से वाकिफ न हो.लेकिन उसकी ये पहल ज़रूर काबिले तारीफ है.याद रखियेगा.कोशिशे हमेशा कामयाब होती है.

Friday, January 21, 2011

हमें तुम पर नाज़ है



अगर हौसला बुलंद हो.तो सारी अरचने अपने आप खत्म हो जाती है.अगर दिल में कुछ करने की हसरत हो.तो खुदा भी आपके साथ होता है.कुछ ऐसा ही हुआ बिहार के गया के इस सपूत अमित विशवकर्मा के साथ.गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाला ये पूत शारीरिक रूप से विकलांग है.पोलियो से पीड़ित है.वाबजूद इसके अमित अपने मन में पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बनने का सपना संजोये हुए था.और आज उसे अपना सपना पूरा होते दिखाई दे रहा है.फ़िलहाल अमित आई .आई.टी.खड़गपुर में दाखिला ले चुका है.लेकिन इस मुकाम पर पहुचने से पहले उसे तमाम तरह की परेसनियो का सामना करना पड़ा.हम सब जानते है कि आई.आई.टी.की पढाई के लिए कितना पैसा होना चाहिए .पर अमित ने उसकी परवाह न करते हुए खुद से ही तैयारी करनी शुरू कर दी.दोस्तों से किताबे मांगकर .वो अपने सपने को पूरा करने में जुटा रहा.और आख़िरकार उसे सफलता मिल गई.उसका चयन आई.आई.टी.खड़गपुर में हुआ.पर उसे यहाँ भी आर्थिक सहायता की ज़रूरत थी.गरीबी का दंश झेलने वाला अमित और उसके पिता जीतेन्द्र कुछ पल के लिए ये सोचकर मायूस हो गए कि.इतना सारा पैसे वो कहाँ से लायेगे.और कौन क़र्ज़ देगा.पर कहते है न भगवन के घर देर है अंधेर नहीं.आई.आई.टी। में सलेक्ट होने के बाद पूरे इलाके में अमित का किस्सा लोग अपने बच्चो को सुनाने लगे.और एक दिन ये खुशखबरी गया के एस . एस.पी . अमित लोढ़ा के कानो तक पहुची.वे अमित से मिले.इस होनहार छात्र ने उन्हें अपनी समस्या बताई.फिर क्या था.एस.स.पी.और उनका विभाग अमित की मदद के लिए आगे आया.और उन्होंने अपने सहयोगियों की मदद से गरीब घर में जन्मे इस इंजीनियर को कम्युनिटी पुलिस के ज़रिये पढाई का सारा खर्च देने का जिम्मा ले लिया.पुलिस विभाग की इस पहल की तारीफ हर किसी ने की.अमित और उसके पिता के लिए तो हर पुलिस अधिकारी भगवान से कम नहीं है.अमित का जज्बा उन तमाम ऐसे लोगो के लिए मिसाल है.जो विकलांग होते हुए भी कुछ बनना चाहते है.क्योकि अमित ने बचपन से ही अपने जेहन में इस बात को बिठा लिया था कि "बदल सकती है तकदीरे,पलट सकती है तदबीरे,गर इंसा चाहे तो नई दुनिया खोज ही लेता है"अंत में अमित...हमें ही नहीं पूरी कायनात को तुम पर नाज़ है.

Tuesday, January 18, 2011

भिखारियों का गाँव



इसे विडंबना कह लीजिये या फिर हमारे सरकारों की लापरवाही कि. आज भी एक गाँव ऐसा है.जहाँ विकास की रोशनी की बाट वहां की जनता जोह रही है.जहाँ के बच्चे स्कूल इसलिए नहीं जाते क्योकि अगर वे स्कूल चले गए तो रात में भूखे सोना पड़ेगा,वहां के लोगो को आज भी प्यास बुझाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है.वहां के लोगो को आज भी तम्बुओ में रात गुजरने पड़ते है.गाँव की कहानी और बयां करें उससे पहले उसका नाम बता देते है.मध्य प्रदेश के कटनी की परेवागर गाँव की ये दास्ता है.इस गाँव में जितने भी परिवार है.सब भिखारी है.फकीर है.और कोई इनकी खबर लेने वाला नहीं है.गाँव की अनार बाई के मुताबिक चुनाव के वक़्त नेता इनसे हर समस्या से निजात दिलाने का वादा करते है.पर जीत जाने के बाद वादा भूल जाते है.तमाम तरह के असुविधा के बावजूद यहाँ के लोग खुश रहते है.गाँव में हर जाति के लोग रहते है.लेकिन उनके बीच मज़हब और अमीरी गरीबी का भेदभाव नहीं है.सबके घर में भीख मांगने के बाद ही चूल्हा जलता है.इनकी हालत सुन हम और आप भले ही दुखी हो.पर वहां के लोगो के चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहता है.गाँव में विकास की रौशनी नहीं पहुची तो विकास की बात करना बेमानी लगता है.फिर भी गाँव का महबूब अपने घर में हर सुविधा रखे है.मसलन टी .वी.,मोबाईल,सी.डी. जब भी गाँव वाले एक साथ बैठते है.मनोरंजन का दौर चल पड़ता है.हालाकि गाँव की रंजीता कहती है कि.जो जिंदगी वो जी रही है.वैसी जिंदगी उसके बच्चे न जिए.पर अफ़सोस की संसाधन के आभाव में गाँव का हर बच्चा भीख मांगने को मजबूर है.सोनू ने बताया कि वो पढाई करना चाहता है.लेकिन अगर वो स्कूल जायेगा तो फिर रात को उसे भूखे सोना पड़ेगा.यानि सबके सब हालत के आगे बेबस है.ज़रा याद कीजिये जब मुंबई कि धारावी पर फिल्म सलाम्डोग मिलेनायर बनी थी.उस वक़्त हमारे नेताओ ने कैसे हल्ला मचाया था कि.फिल्म में भारत की गलत तस्वीर पेश की गई है.लेकिन इस गाँव के बारे में क्या कहेंगे हमारे सफेदपोश.धारावी में रहने वालो को बिजली तो नसीब होती है.पर यहाँ के लोगो को तो आज भी लालटेन युग में जीना पड़ रहा है.एक तरफ तो हम विकसित देश होने का सपना संजो रहे है.वही दूसरी ओर इस गाँव की कहानी उन सपनो को मुह चिढ़ा रही है.कोई बताएगा कि.विकसित हो जाने के पहले क्या परेवागर गाँव की सूरत और सिरत बदल जाएगी?.

Monday, January 17, 2011

अतीत से सबक लेने का वक़्त



पूर्णिया के विधायक राज किशोर केसरी की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई होगी.उसकी हत्या करने वाली रूपम पाठक और उसकी माँ का गुस्सा अभी शांत भी नहीं हुआ कि उतर प्रदेश के बांदा से एक और विधायक का कारनामा सामने आ गया .बांदा की रहने वाली और दुष्कर्म की शिकार हुई नाबालिग युवती के मुताबिक बसपा के विधायक पुरषोत्तम नरेश दिवेदी ने उसके साथ दुष्कर्म किया.और पुलिस में शिकायत करने पर पुलिस वाले उसे इन्साफ देने के बजाय जेल भेज दिया.हलाकि है हाईकोर्ट के आदेश के बाद युवती रिहा हो गई.पर रिहाई के बाद उसने अपने गुस्से का इजहार कुछ इस तरह किया."फांसी की सजा हो उसको.अब वो जेल से न निकलने पाय.और जो उसके आदमी है.उनको भी उसी तरह मारा कुटा जाय.जिस तरह मुझको मारा है.जेल में बंद करके सजा दी जाय .मुझे न्याय तभी मिल पायेगा.जब मेरे साथ दुष्कर्म करने वाले विधायक को फांसी होगी.और कानून सजा नहीं दे पाया तो मैं उससे बदला लूंगी".इस बयान पर गौर करने के बाद इतिहास की याद आती है.जिस लड़की के साथ विधायक ने दुष्कर्म किया वो निषाद है.और ज़रा याद कीजिये दस्यु सुन्दरी फूलन देवी को.उसने भी दुष्कर्म के बाद बागी तेवर अपनाया था.उसके गुस्से के खौफ से हम सब वाकिफ है.इसीलिए ज़रूरी है.पीड़ित लकड़ी को न्याय मिलना.ताकि राज किशोर केसरी और पुरषोत्तम जैसे विधायक के हवस का शिकार कोई और न बन सके.और किसी युवती को हथियार उठाने के लिए मजबूर न होना पड़े.वक़्त आ गया है.जब हम अतीत से सबक लेकर एक मिसाल कायम करें..

Thursday, January 13, 2011

डांस के बदलते मायने



चूकि में बिहार का रहने वाला हू.इसीलिए शुरुआत करते है बिहार से ही.१९९९ में दरभंगा से इंटर करने के बाद आगे की पढाई करने के लिए पटना आया.कुछ दिनों बाद काफी सारे दोस्त बन गए.उन्ही लोगो से पता चला कि सोनपुर मेल में इसबार एक से बढ़कर एक थेयेटर आये है.कोई शोभा सम्राट थेयेटर का नाम ले रहा था तो कोई गुलाब विकास थेयेटर कि तारीफ कर रहा था.में सोच में पड़ गया क्योकि बचपन से सुनता आया था कि सोनपुर मेला पशुओं के लिया फेमस है.पर पटना आने के बाद पता चला कि पशुओ की जगह ले ली है थेयेतारों ने.मेरी उत्सुकता बढ़ी और में भी पंहुचा सोनपुर.पहले तो टिकट लेने में मारामारी करनी पड़ी.और जब टिकट मिल गया तो अन्दर जाने के बाद पता चला की थेयेटर में क्या होता है.और टिकट काउंटर पर क्या अफरा तफरी थी.खैर यकीन मानिये पहली बार देखा और जाना भी की अश्लील डांस क्या होता है.उसके बाद मेरे मन में ये धारना बन गई कि अश्लील डांस सिर्फ और सिर्फ ठेयेतरो में ही होते है.पर ये मिथक कुछ ही दिनों बाद टूट गया.पटना से निकलने के बाद पता चला कि अश्लील डांस सिर्फ फ़िल्मी परदे और ठेयेतरो के पंडालो तक ही सिमित नहीं है.मेरा अगला पड़ाव डेल्ही था .वहां एक दोस्त के साथ जागरण में जाने का मौका मिला.पर वहां भक्ति संगीत की धुन के बजाय लोग अश्लील फ़िल्मी गीत के धुन पर जयादा थिरक रहे थे.भोपाल में भी यही नज़ारा दिखा.वक़्त के साथ फेहरिस्त इतनी लम्बी हो गई है कि बहुत उदाहरण याद भी नहीं.इसीलिए आते है सीधे मुद्दे पर । बॉलीवुड का आइटम सोंग(मुन्नी बदनाम हुई/Sheela की जवानी ) हो.या दोअर्थी भोजपुरी आइटम सोंग (करेंट mare ली / तोहर लहगा उठा देब रिमोट से) हर आयोजन में सुनने को मिल जायेगे और दिखेगे इसकी धुन पर थिरकती बार बलाए .आलम ये है कि कोई नेता चुनाव जीतता है तो जश्न अश्लील ठुमके से होता है.कोई अधिकारी रिटायर होता है तो उसकी बिदाई मुन्नी बदनाम हुई/Sheela की जवानी से होती है.मेरी समझ से पहले अश्लील डांस का चलन बिहार - उत्तर प्रदेश तक ही था.पर अब तो हर स्टेट में इसका चलन हो गया है.छत्तीसगढ़ में कुछ दिनों पहले एक शहीद को अश्लील गीतों के जरिये याद किया गया.और बार बालाओ के डांस हुआ.ज़रा सोचिये क्या थे हम और क्या हो गए.

स्वागतम 2011




वक़्त कभी रुकता नहीं.वो चलता आया है.और चलता रहेगा.इसीलिए बेहतर यही होगा कि.हम और आप भी इसकी रफ़्तार से अपनी रफ़्तार मिला ले.माना की २१ वी सदी का पहला दशक काफी कड़वा अनुभव दे गया.पर ये भी सुच है कि आदमी समस्या और परेशानी झेलने के बाद ही सीखता है.क्योकि.अगर समस्या न हो गम का अहसास नहीं होगा.और गम का अहसास नहीं होगा तो ख़ुशी का अहसास नहीं होगा.तो समझदारी इसी में है कि । बीते हुए कल को आज में घोल दे.और आने वाले कल के लिए एक ऐसा माहोल तैयार करें जहाँ खुशिया ही खुशिया हो.गम और मायूसी की कोई जगह न हो.आइये २०११ का स्वागत करें.और अपने भविष्य के लिए नए सपने संजोये उसे पूरा करें.

Tuesday, January 11, 2011

एक ख़त सोनिया गाँधी के नाम




११ जनवरी २०११ को हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में सोनिया गाँधी का लेख पढ़ा .पढने के बाद मान में बहुत सारें सवाल उठाने लगे.उनके लेख में बहुत बात्तें ऐसी थी.जिसे आधार में शुरुआत कर सकता था.पर आगाज करता हु.उनकी ओर से लिखे गए रोहानी नीलकेनी के शब्दों से.अगर तेज़ दिमाग ,उदार हिरदय और धनवान एक साथ आ जाये तो एक बड़ा बदलाव आ सकता है.तो मैडम मेरा आपसे सवाल है की पिछले करीब एक दसक से आप और आपकी पार्टी उस कुर्शी पैर काबिज़ है.जहाँ से बदलाव की नई इबारत लिखी जा सकती है.आपके पास तेज़ दिमाग वालो की कमी नहीं है.जितना में आपके बारें में जनता हु.आप उदार हेरदय भी है.देश के धनवान लोगो से आपकी दोस्ती भी है.आप खुद भी उस फेहरिस्त में आती है.तो फिर क्यों नहीं कुछ नया दिखाई दे रहा है हिंदुस्तान में.मेरा दूसरा सवाल.सेवा से जुड़ा हुआ है.आपने अपने लेख में सेवा से जुड़े कई अहम् और बड़े लोगो के कोटेशन इस्तेमाल किये है.ये अच्छी बात है.पर सोनिया जी अभी कुछ दिनों पहले ही.जब डेल्ही में कड़ाके की सर्दी थी.और ठण्ड की ठिठुरन अपने पिछले सारे रिकॉर्ड को तोड़ रही थी.उसी दरम्यान आपके निवास १० जनपथ के आगे मध्य प्रदेश के बेतुल से एक गरीब परिवार मदद की आस लेकर पंहुचा.उस दम्पति के साथ दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे.बच्चो की माँ के दोनों हाथ कटे हुए थे.और उस परिवार का मुखिया बीमार था.करीब एक हफ्ते तक वो आपके निवास के आगे मदद की भीख दिन रात मांगते रहा.पर न तो आप उअस्से मिलना मुनासिब समझी .और न ही मदद करना.हा...आपने इतना ज़रूर कियाकि डेल्ही की मुखिया को आदेश देकर उस परिवार को किसी धरमशाला में भेज दिया.लाचार परिवार मीडिया के सामने मदद की भीख मागता रहा.पर आपकी ओर से उसे रेस्पोंसे नहीं मिला.अब आपको थोडा अतीत में ले जाना चाहता हु.याद कीजिये अपने सुपुत्र और देश के भावी परधानमंत्री राहुल गाँधी का महाराष्ट्र की रहने वाली कलावती पर दिया गया बयान.पर अफसोश की जिस क़र्ज़ की बोझ के चलते कलावती की मांग का सिंदूर मिट गया.उसी क़र्ज़ की असहनीय मार की वजह से उसकी बेटी भी बिधवा हो गई.शायद आप चाहती तो एक माँ के सामने उसकी जवान बेटी सफ़ेद साडी नहीं पहनती.और बेतुल से डेल्ही आई उस परिवार को धरंशाला नहीं जाने देती.आपही के मुताबिक सबसे बड़ी उपलब्धि दूसरों को देना है.देश की सबसे शक्तिशाली महिला के रूप में पहचान है आपकी.और इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए.कम से कम मुझे तो नहीं है.चूकी आपने लेख में गरीबी के आकडे को छुआ है.तो आपसे मेरा आपसे तीसरा सवाल है की.आपकी सास और देश की पहली महिला परधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने कहा था की वे गरीबी को भारत से हटा के रहेंगी.वो अब इस दुनिया में नहीं है.पर उनके इस सपने को पूरा करने का आपके पास भरपूर मौका है.आप सत्ता में है.डॉक्टर मनमोहन सिंह आपकी सरकार के मुखिया है.योजना आयोग के वइस प्रेसिडेंट के तौर पर मोंटेक सिंह अहलुवालिया है आपके पास .तो फिर क्या नहीं महगाई का दानव का दायरा सिकुड़ रहा है.कभी मौका मिले तो झुग्गी में रात बिताने वाले उन ९.३ करोड़ लोगो के बारें में सोचियेगा की क्या उनके घर सब्जी बनती होगी.क्या उनके बच्चे दूध पीते होंगे.और अगर दूध मिल भी गया तो उसमे डालने के लिए उन्हें चीनी मिलता होगा.उन १२.८ करोड़ लोगो के बर्रें में सोचियेगा.जिन्हें साफ़ पानी तक नसीब नहीं होता.देश के उन ७० लाख बच्चो के भविष्य के बर्रें में आपका क्या ख्याल है.जो गरीबी की चादर से इस कदर ढके है की शिक्षा की रौशनी का उन्हें पता ही नहीं.उन माता पिता का क्या.जिनके बच्चे कुपोषण की आज में झुलस रहे है.और धीरे धीरे मौत के करीब आतें जा रहें है.आपके मुताबिक हमारे देश में बहुतो के पास अकल्प्निये दौलत है .तो फिर कोई ऐसे उपाय कीजिये सोनिया गाँधी जी जो.आमिर इंडिया और गरीब भारत के बीच की खाई को पाट सके.हो सके तोकुछ पहल कीजियेगा...वरना...उपदेश तो देने के लिए ही होतें है............
राज किशोर झा
लेखक टी.वी.पत्रकार है.(ये उनके निजी विचार है.)