Thursday, October 6, 2011

क्रोध की आग में जलता समाज



रामलीला मैदान में पुलिस की बर्बरता का शिकार हुई राजबाला अब इस दुनिया से रुखसत हो चुकी है। हरियाणा के सोनीपत में उसकी चिता की आग भले ही शांत हो गई है। लेकिन उसकी राख के भीतर अब भी कई सवाल कौंध रहे हैं। या यूं कहे कि,समाज,सरकार और सिस्टम से ये पूछ रहा है कि,क्या इसी हिंसात्मक समाज,सरकार और सिस्टम का सपना बापू ने देखा था। मैं सोचता हूं अच्छा हुआ बापू हमें अलविदा कह गए। अगर हमार बीच होते तो मौजूदा हालात को देख उनकी आंखों से आंसू छलक पड़ते। हिंसात्मक समाज के इस मौजूदा स्वरूप को देखकर बेचैन हो उठते। जिस तरीके से आज बात-बात पर लोगों को गुस्सा आ जाता है। जिस तरीके से लोग क्रोध की ज्वाला को खून बहाकर शांत करते हैं। जिस ढंग से लोग रिश्तों को शर्मसार कर रहे हैं। वो कतई एक सभ्य समाज का परिचय नहीं हो सकता। बीते चार जून को रामलीला मैदान में जिस तरीके से पुलिसवालों ने अपना फर्ज निभाया। उसे कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। ये सच है कि,भीड़ पर काबू पाने के लिए कभी-कभी लाठी चलाने की जरूरत आन पड़ती है। लेकिन उसके भी तरीके हैं। आज हमारे बीच के ज्यादातर खाकीधारी अपने फर्ज और तरीके को भूल चुके हैं। रामलीला मैदान में भी उस रात जितने भी पुलिसवाले मौजूद थे। उनमें से अधिकांश फर्ज और नियम-कायदों को भूलकर वर्दी के नशे में चूर थे। तभी तो उन्होंने राजबाला पर इस तरह लाठी से प्रहार किया कि,उसकी रीढ की हड्डी ही टूट गई और आखिरकार 26 सितंबर 2011 को वो दर्द से कराहती हुई इस जहां को अलविदा कह गई। सरकार और सिस्टम के गलत रवैये के चलते ही समाज की रक्षा के लिए वर्दी पहनने वाले पुलिसकर्मी दरिंदे का रुख अख्तियार करते जा रहे हैं। यूपी के चंदौली में भी 27 सितंबर को पुलिस की दरिंदगी का शिकार एक ट्रक चालक को होना पड़ा। चंदौली के नौबतपुर में पुलिसवालों को ये बात नागवार गुजरी कि, ट्रक चालक ने रिश्वत क्यों नहीं दिया। कानून के रखवाले इस कदर क्रोधित हो उठे कि,पीट पीटकर उसकी जान ले ली। फ्लैश बैक में जाएंगे तो ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे। सिर्फ पुलिसवाले या सरकार में शामिल लोग ही अंहकार की आग में नहीं जल रहे। बल्कि समाज में भी ऐसे हजारों दास्तान मिल जाएंगे। मैं इस वक्त छत्तीसगढ़ में कार्यरत हूं। इसीलिए यहां की कुछ हिंसक वारदात के बारे में बता रहा हूं। यहां पर ज्यादातर खबरें ऐसी आती हैं। जिसमें कोई बाप अपने बेटे को महज इसलिए मार देता है ताकि उसे संपत्ति का बंटवारा न करना पड़े। कोई भतीजा अपने चाचा को कत्ल इसलिए कर देता है,क्योंकि उसे चाचा का डांटना पंसद नहीं था। कोई पति अपनी पत्नी को इसलिए जिंदा जला देता है,क्योंकि उसकी पत्नी उसे शराब छोड़ देने को कहती है। इतना ही नहीं कई ऐसी खबरें भी सामने आई हैं या आते रहती है जिसमें मामूली विवाद पर इंसान-इंसानियत को भूल हैवान बन जाता है। ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरता जिस दिन इंसानियत का खून न होता हो। आखिर क्या हो गया है हमारे समाज को,जो बात-बात पर क्रोध की ज्वाला धधक उठती है। आखिर कब बंद होगा इंसानियत को शर्मसार करने का ये खेल ?...आखिर कब बुझेगी ये आग ?...आखिर कब ?...

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