Thursday, October 6, 2011

चाल,चरित्र और चेहरा



हमारे देश में संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है। लेकिन अफसोस कि,इस मंदिर में जनता के प्रतिनिधि के तौर पर विराजमान तथाकथित देवता जितने सफेद कपड़े पहनते हैं। उतने ही काले उनके विचार और मन हैं। 16 अगस्त 2011 से पहले ऐसा महसूस होता था कि, कुछेक सफेदपोश ही भ्रष्टाचार को खत्म नहीं होने देना चाहते। पर अन्ना के आंदोलन दौरान और बाद में ये अच्छे तरीक से समझ में आ गया कि,ये सारे के सारे हमाम में नंगे हैं। मेरे विचारों पर सबसे पहली मुहर कांग्रेस के युवा प्रवक्ता मनीष तिवारी ने लगाई। अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन का आगाज किया और महाशय मनीष तिवारी ने बडे़ ही बेशर्मी के साथ अन्ना जैसे बेदाग छवि वाले को भ्रष्टाचारी तो कहा ही, साथ ही उन्हें 'तुम' कहकर भी संबोधित कर दिया। इसके बाद पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय ने अन्ना को पागल कह दिया। फिर संसद में लोकपाल के मुद्दे पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की बोलने की बारी आई। उनके बोलने के पहले मैं ऐसा सोच रहा था कि,वे जरूर कुछ अच्छा बोलेंगे। लेकिन उन्होंने मेरी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। राहुल ने लोकसभा में हंगामें के बीच लिखा हुआ भाषण पढ़ दिया। बड़ा दुख हुआ जो शख्स एक मजबूत भारत का सपना देख रहा है। उसकी नींव इतनी खोखली होगी। कांग्रेसी नेताओं ने दिल तोड़ा तो आस भाजपा से लगा बैठा। लगा कि,भाजपा विश्वासघात नहीं करेगी। लेकिन जनलोकपाल के मुद्दे पर भाजपा ने भी अपना असली चेहरा दिखा दिया। पूरे संसद में उस दिन कोई ऐसा नहीं था जो खुलकर अन्ना के समर्थन में बोलता। इसके बाद जब अन्ना ने लोगों से अपने-अपने जनप्रतिनिधियों के आवास के बाहर धरना-प्रदर्शन करने की अपील की। तो सांसद अजीबोगरीब स्थिति में आ गए और आनन-फानन में सबने एक स्वर में अन्ना के तीनों शर्तों पर सहमति की मुहर लगा दी। इस पूरे घटनाक्रम में कई बातें सामने आई। जिस पर सोचना लाजिमी है। अन्ना के आंदोलन के दौरान अभिनेता ओमपुरी ने हमारे सांसदों को नालायक,अपपढ़ और गंवार कहा। किरण बेदी ने बेहरुपिया कहा तो इन सबको मिर्ची लग गई। सांसदों ने इसे संसद का अवमानना करार दे दिया। शरद यादव ने तो लंबा-चौड़ा भाषण दे दिया। सच कड़वा होता है दोस्तों और इस कड़वाहट को पचा पाना इन सफेदपोशों के बस में नहीं। अवमानना शब्द के मायने शायद हमारे सांसदों को नहीं पता है। अगर होता तो शरद यादव जैसे अनुभवी नेता राष्ट्रपति को 'सफेद हाथी' और राज्यपाल को 'बूढ़ी गाय' नहीं कहते। लालू प्रसाद यादव लोकतंत्र के मंदिर में सोते नहीं। मनीष तिवारी,सुबोधकांत सहाय अन्ना को 'तुम' और 'पागल' नहीं कहते। कांग्रेस के बतौलेबाज महासचिव दिग्विजय सिंह अन्ना को भाषा पर नियंत्रण रखने की सीख नहीं देते। दिग्गी राजा को कौन बताए कि,अन्ना के पोशाक जितने सफेद हैं। उतनी ही साफ-सुथरी उनकी छवि है। गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले दिग्गी अन्ना के चरित्र के आगे कहीं नहीं टिकते। हमारे जनप्रतिनिधि कहते हैं कि,उनकी चाल बिलकुल सटीक है। चरित्र बेदाग है और चेहरा कमल की पंखुरियों के सामान कोमल हैं। तो फिर उन्हें जनलोकपाल बिल से एतराज क्यों है। ऐसा तो नहीं कि,अन्ना का जनलोकपाल बिल उनकी चाल का राज खोल देगा। उनके बेदाग चरित्र के पीछे छिपे धब्बों को उजागर कर देगा और कमल की पंखुरियों के तले उन्होंने भ्रष्टाचार की जो परत तैयार की है। उसे कुरेद कर जनता के सामने रख देगा। अरे महोदयों,अपने चाल,चरित्र और चेहरा का ख्याल नहीं है तो कम से कम देश के चाल,चरित्र,चेहरा का मान तो रखिए। अंत में आप सबों के लिए बशीर बद्र की ये पंक्तियां 'सभी चार दिन की हैं ये चांदनी,ये रियासतें,ये वजारतें...मुझे उस फ़कीर की शाने दे,के ज़माना जिसकी मिसाल दे'।

No comments:

Post a Comment