Wednesday, February 16, 2011

बदरंग "हिना"




बहुत छोटा था जब फिल्म "हिना"देखने गया था . पहली दफा में कहानी तो समझ में नहीं आया.पर एक गीत जुबान पर ऐसे चढ़ा कि आज भी गुनगुनाते रहता हू.गाने का बोल है."मै हू खुशरंग हिना".बड़ा हुआ तो फिर से देखने गया.तब समझ में आया स्टोरी और हिना का मतलब."हिना" का अर्थ होता है -मेहँदी .जिसे हमारे घरों की औरते हाथो पर लगाती है.मेहँदी लगते वक़्त ठंडक देती है.और जब सूखने के बाद ख़ुश्बू के साथ चमक बिखेरती है.जिसे देख रूह को सुकून मिलता है.खैर एक बार फिर बात करते है फिल्म हिना की.फिल्म में हिना नाम की किरदार को एक ऐसे शख्स से प्यार हो जाता है जो अपनी यादास्त खो चुका है.और उसकी यादास्त तब वापस आती है.जब हिना के हाथो में उस शख्स के नाम की मेहँदी लग चुकी होती है.फिल्म में हिना अपनी नाम के मायनो को सही ठहराते हुए मेहँदी की खुश्बू को बदरंग कर देती है.तब से लेकर आज तक हिना और उसके मायने से अजीब सा लगाव हो गया है.कुछ दिनों पहले अखबारों में दो ऐसी ही हिना नाम की लड़की की कहानी पढ़ा.पढ़ने के बाद सोचने के लिए मजबूर हो गया कि.एक काल्पनिक हिना है जो खुद से बदरंग हुई.और एक वास्तविक हिना है.जिसे उसके अपनों ने ही बदरंग कर दिया.बंगलादेश की राजधानी ढाका से करीब ४० किलोमीटर दूर एक गाँव में १४ साल की लड़की का नाम उसके माँ-बाप ने बड़े ही प्यार से हिना रखा.हिना बचपन से ही अपने परिवार के लिए सोचती रहती थी.पर उसे क्या पता था कि.उसके ये इरादे उसके अपने ही बड़े भाई के हाथो काफूर हो जायेगे.हमेशा की तरह हिना उस दिन भी शौच के लिए बहार जा रही थी.उसी वक़्त उसका बड़ा भाई महबूब .जो हिना से उम्र में २६ साल बड़ा था.हिना को अपनी हवस का शिकार बना लिया.जब हिना ने विरोध किया तो महबूब की पत्नी ने १४ साल की गुडिया को समाज में बदचलन बना दिया.फिर तालिबानी पंचायत ने हिना को १०० बांस मारने का फरमान सुना दिया.और इस तरह माँ अकलीमा बेगम और पिता दर्बेश खान की आँखों के सामने हर बांस के वार के साथ हिना की चमक और खुश्बू फीकी होती चली गई.ठंडक,चमक और खुश्बू बिखेरने वाली हिना को समाज और उसके भाई ने इतना बदरंग कर दिया कि.वो हमेशा - हमेशा के लिए मौत कि आगोश में चली गई.और एक ऐसी कहानी बन गई.जो न जाने आने वाले कितने वक़्त तक समाज से ये सवाल करती रहेगी कि.आखिर हिना का कसूर क्या था ?.ताज्जुब की बात ये है कि.ये सबकुछ उस देश में हुआ जहाँ कोर्ट ने फतबे या इस्लामिक आदेश के नाम पर औरतो को दी जानेवाली चाबुक या डंडे की पिटाई की सजा को अपराध घोषित कर दिया था.इतना ही नहीं बंगलादेश में औरतो का पीछा करना भी अपराध है.बंगलादेश में फतबे से जुडी आकड़ो पर गौर फरमाएंगे तो रूह कांप उठेगी.बंगलादेश महिला परिषद् के आंकड़ो के मुताबिक २००२ में ३९ महिलाये मार दी गई.२००३ में ४४ औरते इसका शिकार हुई.२००४ में ५९,२००६ में ६६,२००७ में ७७,२००८ में २१ तो २००९ में ४८ महिलाओ की जीवनलीला तालिबानी फतबे के कारण खत्म हो गई.दूसरी एक और हिना की जिंदगी उसके अपनों ने ही उतरी इटली में खत्म कर दी.पाकिस्तानी मूल की २० साल की हिना के जिस्म पर २८ बार चाकू से सिर्फ इसलिए उसके पिता ने वार किया क्योकि हिना वेस्टर्न कपडे पहनने लगी थी.यहाँ बात सिर्फ बंगलादेश और इटली की हिना की नहीं.नज़र उठायेगे तो कई ऐसी हिना की कहानी आसपास मिल जाएगी.कहने को तो पूरी दुनिया में बेटी बचाओ का नारा दिया जाता है.लेकिन हिना की कहानी ऐसे नारों की ज़मीनी हकीकत पर पानी फेरने के लिए काफी है.बेटियों के साथ ऐसे वर्ताव के चलते ही शायद वाइस प्रेसिडेंट की पत्नी सलमा अंसारी कही होगी कि.बेटियों को पैदा होते मार देना चाहिए.सुधार के लिए मुहीम चलाना ज़रूरी है.पर उससे भी ज़रूरी है.लोगों कि सोच को बदलना.जो अपनी हवस को बुझाने और इज्ज़त की दुहाई देकर अपनों को भी रौंदने से नहीं चुकते.एक कारगर पहल की दरकार है जिससे की आगे से कोई हिना बदरंग न हो.फ़िलहाल तो मुझे बशीर बद्र साहब की ये कुछ पंतिया याद आ रही है."ये पानी है मगर आँखों का ऐसा पानी,जो हाथों पर रची मेहँदी छुड़ाकर ले जाय".

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